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हाल ही में चर्चा में रहा जनरल कॉनकरेंस परकोलेशन (GCP) प्रोटोकॉल मुख्य रूप से किस क्षेत्र से संबंधित है?
क्वांटम संचार
जीन संपादन
उपग्रह नेविगेशन
परमाणु संलयन
क्वांटम संचार
कोलकाता के बोस इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने लंबी दूरी के क्वांटम संचार को बढ़ाने के लिए जनरल कॉनकरेंस परकोलेशन (GCP) प्रोटोकॉल विकसित किया है।
क्वांटम नेटवर्क को सिग्नल के खराब होने और डिकोहेरेंस के कारण लंबी दूरी तक एंटैंगलमेंट वितरित करने में महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। GCP फ्रेमवर्क इन नेटवर्क में कनेक्टिविटी को अनुकूलित करने के लिए सांख्यिकीय भौतिकी (statistical physics) का एक नया दृष्टिकोण प्रदान करता है। आवश्यक एंटैंगलमेंट की सीमा को कम करके, यह प्रोटोकॉल अधिक कुशल और संसाधन-अनुकूल संचार को सक्षम बनाता है। यह क्वांटम सूचना और नेटवर्क विज्ञान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण प्रगति है।
यह प्रोटोकॉल बोस इंस्टीट्यूट, कोलकाता के शोधकर्ताओं द्वारा विकसित किया गया था।
बोस इंस्टीट्यूट विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के तहत एक स्वायत्त अनुसंधान संगठन है।
GCP गैर-सबसे छोटे पथों (non-shortest paths) के प्रति संवेदनशील होकर कनेक्टिविटी में सुधार करता है, जिससे क्वांटम नेटवर्क में उच्च लचीलापन मिलता है।
यह फ्रेमवर्क नेटवर्क कनेक्टिविटी के लिए आवश्यक न्यूनतम क्वांटम संसाधनों को कम करके एंटैंगलमेंट वितरण को अनुकूलित करता है।
A सही है — जनरल कॉनकरेंस परकोलेशन (GCP) प्रोटोकॉल एक सैद्धांतिक ढांचा है जिसे क्वांटम संचार नेटवर्क की दक्षता और पहुंच में सुधार करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
याद रखें कि परकोलेशन थ्योरी सांख्यिकीय भौतिकी की एक अवधारणा है; जब इसे 'क्वांटम' और 'कॉनकरेंस' के साथ जोड़ा जाता है, तो यह विशेष रूप से क्वांटम नेटवर्क में नोड्स को जोड़ने के गणित को संदर्भित करता है।