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विरासत के नियमों को बनाने में किन दो विषयों के ज्ञान ने मुख्य भूमिका निभाई?
गणित और विज्ञान
भूगोल और दर्शन
दर्शन और विज्ञान
गणित और इतिहास
गणित और विज्ञान
प्राचीन कानूनी ढांचे का विकास, विशेष रूप से विरासत और सामाजिक विनियमन के संदर्भ में, विभाजन और हिस्सों (अंकगणित) के लिए गणितीय गणनाओं और वैज्ञानिक तार्किक तर्क (अक्सर धर्मशास्त्र और खगोलीय अवलोकन में निहित) पर बहुत अधिक निर्भर था। इस संश्लेषण ने यह सुनिश्चित किया कि विरासत के कानून मात्रात्मक और सामाजिक संरचनाओं के अनुकूल दोनों हों।
प्राचीन कानूनी ढांचे का विकास, विशेष रूप से विरासत और सामाजिक विनियमन के संदर्भ में, विभाजन और हिस्सों (अंकगणित) के लिए गणितीय गणनाओं और वैज्ञानिक तार्किक तर्क (अक्सर धर्मशास्त्र और खगोलीय अवलोकन में निहित) पर बहुत अधिक निर्भर था। इस संश्लेषण ने यह सुनिश्चित किया कि विरासत के कानून मात्रात्मक और सामाजिक संरचनाओं के अनुकूल दोनों हों।
प्राचीन भारत में विरासत कानूनों के लिए मूलभूत ग्रंथ जीमूतवाहन द्वारा 'दायभाग' और विज्ञानेश्वर द्वारा 'मिताक्षरा' हैं, जिन्होंने स्थानीय रीति-रिवाजों को स्थापित गणितीय और दार्शनिक तर्क के साथ एकीकृत किया।
विरासत कानूनों के लिए आनुपातिक विभाजन (अंकगणित/गणित) की आवश्यकता थी।
सामाजिक और वैज्ञानिक अवलोकन ने वंशानुक्रम (विज्ञान) के लिए ढांचा प्रदान किया।
मिताक्षरा जैसे प्राचीन कानूनी ग्रंथों ने संपत्ति के विभाजन के लिए गणितीय अनुपात का उपयोग किया।
विकल्प B (भूगोल और दर्शन) गलत है क्योंकि भूगोल संपत्ति को विभाजित करने की विशिष्ट गणितीय आवश्यकता के मुकाबले गौण था।
प्राचीन भारतीय कानून में तर्क का एकीकरण अक्सर न्याय (तर्क/विज्ञान) दर्शन स्कूल से जुड़ा हुआ है।
विरासत (दायभाग/मिताक्षरा) हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के इतिहास का एक मुख्य घटक बना हुआ है।
A सही है — प्राचीन विरासत कानूनों के निर्माण में विभाजन के लिए गणितीय सटीकता और संरचित उत्तराधिकार के लिए वैज्ञानिक तार्किक ढांचे का उपयोग किया गया था।
इसे भारतीय राजनीति में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (1956) के अध्ययन से जोड़ें, जो इन प्राचीन विरासत सिद्धांतों का आधुनिक विकास है।